Śiva - Popular Mantras/Stutis attributed to him
This post explores some of the renowned mantras and stutis dedicated to Bhagavān Śiva, as found in the Vedas and other sacred texts.
1. ॐ नमः शिवाय(Pañcāksarī Mantra)
Meaning - I bow down to Bhagavān Śiva
This mantra appears in 4.5.8.1 of Taittirīya Saṃhitā of Kṛṣṇa-Yajur-Veda and 5.41 in Rudrāṣṭādhyāyī of Vājasaneyi-Saṃhitā of Śukla-Yajur-Veda
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=zEGD7ZDcHMo
2. महामृत्युञ्जयमन्त्र(Mahāmrityunjaya Mantra)
This mantra appears in 7.59.12 of Ṛgveda & 6.5 in Rudrāṣṭādhyāyī of Vājasaneyi-Saṃhitā of Śukla-Yajur-Veda
Ṛṣi: वशिष्ठ(Vasiṣṭha), Devatā: रूद्र (Rudraḥ), Metre: अनुष्टुप्(Anuṣṭup)
त्र्य॑म्बकं यजामहे सु॒गन्धिं॑ पुष्टि॒वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॑त् ॥
दिव्य गन्धसे युक्त, मृत्युरहित, धन-धान्यवर्धक, त्रिनेत्र रुद्र की हम पूजा करते हैं। वे रुद्र हमें अपमृत्यु और संसाररूप मृत्युसे मुक्त करें। जिस प्रकार ककड़ी (फूट) का फल अत्यधिक पक जानेपर अपने वृन्त (डंठल) से मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम भी मृत्यु से छूट जायँ; किंतु अभ्युदय और निःश्रेयसरूप अमृत से हमारा सम्बन्ध न छूटने पाये ।
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=Usi1qTqwPgU
3. रूद्र सूक्त(Rudra Sūktas) from Ṛgveda
Followings are Rudra Suktas from Ṛgveda fully dedicated to Rudra
1. 1.43 - 9 Mantras - Ṛṣi: Kaṇva Ghaura, Meter: Gāyatrī
2. 1.114 - 11 Mantras - Ṛṣi: Kutsa ĀṅGirasa, Meter: Jagatī
3. 2.33 - 15 Mantras - Ṛṣi: Gṛtsamada Śaunaka Meter: Nicṛttriṣṭup
4. 6.74 - 4 Mantras (Paired with Soma) - Ṛṣi: Bharadvāja Bārhaspatya, Meter: Triṣṭup
5. 7.46 - 4 Mantras - Ṛṣi: Vasiṣṭha, Meter: Virāḍjagatī
These Mantras can be listened here https://youtu.be/0miE2j-X0Gw?t=13
4. रुद्राष्टकम्(Rudrāṣṭakam)
A Brāhmaṇa recited this stuti for Bhagavān Śiva to lift the curse upon his disciple( Kākabhuśuṇḍi's previous birth). This stuti is embedded within the Uttarakāṇḍa of Rāmacaritamānasa.
रुद्राष्टकम् can be listened here https://youtu.be/P2kAlN8dtGo?t=121
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥1॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥3॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥
न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥
जरा जन्म दुःखोद्य तातप्यमानं॥ प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥
हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात् मायादिरहित), (मायिक) गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले) आपको मैं भजता हूँ॥1॥
निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥
जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है॥3॥
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ॥4॥
प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मे, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ॥5
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानंदघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए॥6॥
जब तक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शांति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले हे प्रभो! प्रसन्न होइए॥7॥
मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म (मृत्यु) के दुःख समूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥8॥
5. श्रीरुद्रम्(Śrī-rudram)
श्रीरुद्रम् has 2 sections नमकम् & चमकम्
- The word नमः / नमो appears repeatedly in नमकम्, while चमे recurs throughout the चमकम्
- नमकम् is invoked for surrender to रुद्र
- चमकम् is invoked for the fulfilment of wishes
- नमकम्(Namakam) - Appears in 4.5 of Taittirīya Saṃhitā of Kṛṣṇa Yajurveda & 5th अध्याय of Rudrāṣṭādhyāyī of Vājasaneyi-Saṃhitā of Śukla-Yajur-Veda
- चमकम्(Chamakam) - Appears in 4.7 of Taittirīya Saṃhitā of Kṛṣṇa Yajur-Veda & 8th अध्याय of Rudrāṣṭādhyāyī of Vājasaneyi-Saṃhitā of Śukla-Yajur-Veda
नमकम् + चमकम् can be read here from https://archive.org/details/RudrashtadhyayiGItaPressGorakhpur/page/n105/mode/2up to https://archive.org/details/RudrashtadhyayiGItaPressGorakhpur/page/n143/mode/2up + from https://archive.org/details/RudrashtadhyayiGItaPressGorakhpur/page/n157/mode/2up to https://archive.org/details/RudrashtadhyayiGItaPressGorakhpur/page/n177/mode/2up (Śukla-Yajur-Veda)
6. रूद्र अष्टाध्यायी(Rudrāṣṭādhyāyī)
- This is taken from the Vājasaneyi-Saṃhitā of Śukla-Yajur-Veda, comprising 8 chapters.
- The ritual of "रुद्राभिषेक" is performed using the mantras from the "रूद्र अष्टाध्यायी"
- नमः शिवाय appears in 5th अध्याय & महामृत्युञ्जयमन्त्र appears in 6th अध्याय
- 5th and 8th अध्याय are respectively called नमकम् & चमकम्
- 5th अध्याय is called शतरुद्रीय as well since there are 100 forms of रुद्र mentioned here
1st अध्याय - 10 Mantras - शिवसङ्कल्प सूक्त
2nd अध्याय - 22 Mantras - पुरुषसूक्त & उत्तरनारायण सूक्त
3rd अध्याय - 17 Mantras - अप्रतिरथ सूक्त
4th अध्याय - 17 Mantras - मैत्र सूक्त
5th अध्याय - 66 Mantras - रूद्रसूक्त / शतरुद्रीय / नमकाध्याय
6th अध्याय - 8 Mantras - महच्छिर
7th अध्याय - 7 Mantras - जटा
8th अध्याय - 29 Mantras - चमकाध्याय
रूद्र अष्टाध्यायी can be read here from https://archive.org/details/RudrashtadhyayiGItaPressGorakhpur/page/n73/mode/2up to https://archive.org/details/RudrashtadhyayiGItaPressGorakhpur/page/n143/mode/2up
It can be listened here: https://youtu.be/XLoJUgBEnIg?t=860
7. शिव-कवच (Śiva-Kavaca)
This kavaca is embedded into 3.3.12 of Skanda Purāṇa. It was narrated by Ṛṣabha Śivayogī. It has 43 श्लोक
8. दक्षिणामूर्ति स्तोत्र(Dakṣiṇāmūrti Stōtra)
This stōtra is composed by Ādi Śaṅkarācārya. It has 10 श्लोक
It can be read here: https://shlokam.org/dakshinamurthystotram/
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=IIVKhZrFLDQ
9. शिवानन्दलहरी(Śivānandalaharī)
10. शिव-सहस्रनाम(Śiva-Sahasranāma)
There are 3 Śiva-Sahasranāma which contain 1000/1008 names of Bhagavān Śiva.
- From Anuśāsana Parva of Mahābhārata by Sage Upamanyu → Bhagavān Kṛṣṇa → Yudhiṣṭhira - https://archive.org/details/OYSe_mahabharata-part-6-gita-press-gorakhpur/page/n117/mode/2up to https://archive.org/details/OYSe_mahabharata-part-6-gita-press-gorakhpur/page/n129/mode/2up
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=MiwjeaQZ1pY - From 1.65 Chapter of Liṅga Purāṇa by Sage Taṇḍī - https://archive.org/details/DCoB_linga-mahapuran-of-veda-vyas-with-illustration-gita-press/page/n293/mode/2up to https://archive.org/details/DCoB_linga-mahapuran-of-veda-vyas-with-illustration-gita-press/page/n299/mode/2up
- From 1.98 Chapter of Liṅga Purāṇa by Bhagavān Viṣṇu - https://archive.org/details/DCoB_linga-mahapuran-of-veda-vyas-with-illustration-gita-press/page/n531/mode/2up to https://archive.org/details/DCoB_linga-mahapuran-of-veda-vyas-with-illustration-gita-press/page/n537/mode/2up
11. "कर्पूरगौरं" श्लोक
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ||
Meaning: जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।
(Pure white like camphor, an incarnation of compassion, the essence of worldly existence, whose garland is the king of serpents, always dwelling inside the heart's lotus. I bow to Shiva and Shakti together.)
13. द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्र(Dvādaśa Jyotirliṃga Stotra)
13. शिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्तोत्र(Śiva Pañcākṣaramantra Stotra)
14. शिवाथर्वशीर्ष(Śiva-Atharvaśīrṣa)
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=zQsB2pJUrq0
It can be read here: https://sanskritdocuments.org/doc_shiva/shivAShTakam3.html
Hindi translation: https://archive.org/details/QtMd_stotra-ratnavali-gita-press-gorakhpur/page/n31/mode/2up
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=7D2s13jyuxE
It can be listened here: https://www.youtube.com/watch?v=hEYbVtf0UNQ
It's taken from 13.241-277 of Ugrākhya Saptamāṃśa in Śiva-rahasya.
It can be read here with the English translation: https://sanskritdocuments.org/doc_shiva/lingashhMean.html
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